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दतिया ब्यूरो दीपक श्रीवास्तव
रिपोर्टर चेतन दास सुखानी
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में संपूर्ण देश वंदे मातरम् के उद्घोष से गुंजायमान हो रहा है, इसी क्रम में दतिया जिले के बड़ौनी खण्ड के घूंघसी ग्राम में विराट हिन्दू सम्मेलन संपन्न हुआ, जिस मे लगभग 10,000 महिला व पुरुषों ने परम पूज्य शंकराचार्य जी के अमृत वचनों का लाभ लिया और कार्यक्रम के अंत में भारत माता की करती के उपरांत भोजन प्रसादी के बाद अपने अपने गंतव्य को प्रस्थान किया, कार्यक्रम में मंच पर मुख्य रूप से उपस्थित रहे, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सर कार्यवाह माननीय श्री रामदत्त जी चक्रधर, परम् पूज्य महामंडलेश्वर श्री अनुरूद्यवन जी धूमेशवर सरकार,
श्रीमति पूनम दंडोतिया सेवा भारती प्रांत किशोर विकाश सह संयोजिका,
मंच का संचालन मनोज दुबे जी ने किया,
अध्यक्षीय उद्बोधन में परम् पूज्य शंकराचार्य जी ने कहा की रावण ने जब अत्याचार करना शुरू किया तो तो स्वयं भगवान विष्णु को श्री राम रूप में अवतार लेना पड़ा, जब जब पृथ्वी पर कोई संकट आता है, भगवान स्वयं अवतार लेते है।
उन्होंने बताया कि अब समय आ गया है कि हिन्दू समाज सभी भेदभाव भूलकर सिर्फ हिन्दू के नाते ही किसी भी समस्या के समाधान के लिए एकजुट होकर खड़ा होगा।
श्री अनिरुद्ध जी महाराज ने ग्रामीण जनों को नशा मुक्ति की शपथ दिलवाई एवं दीदी पूनम दंडोतिया जी ने पांच परिवर्तन के विषयों का विस्तार पूर्वक प्रतिपादन किया।
श्री मान रामदत्त जी के अपने उद्वोधन में कहा कि
आज हम यहाँ अपने अस्तित्व, अपनी पहचान और अपने दायित्व का स्मरण करने आए हैं।
यह कोई साधारण सम्मेलन नहीं है।
यह हिन्दू आत्मचिंतन का संगम है। यह वह मंच है जहाँ
हम स्वयं से प्रश्न करते हैं—
हम कौन हैं?
हमारी पहचान क्या है?
और इस राष्ट्र के प्रति हमारा कर्तव्य क्या है?
हिन्दू कोई पंथ नहीं है,
हिन्दू कोई संप्रदाय नहीं है,
हिन्दू कोई केवल पूजा-पद्धति नहीं है। हिन्दू एक जीवन दृष्टि है,
जो “वसुधैव कुटुम्बकम्” का संदेश देती है।
जिसने दुनिया को सहिष्णुता सिखाई, जिसने संघर्ष नहीं, समाधान दिया,जिसने तलवार से नहीं, संस्कार से समाज जोड़ा।
लेकिन आज हमें आत्ममंथन करना होगा।
आज जब दुनिया अपनी-अपनी पहचान को लेकर जाग रही है,
आज जब हर समाज संगठित हो रहा है,
तो प्रश्न उठता है—
क्या हिन्दू समाज संगठित है?
क्या हम अपने दायित्वों के प्रति सजग हैं?
यही प्रश्न इस हिन्दू सम्मेलन का आधार है।
इतिहास साक्षी है—
जब-जब हिन्दू समाज संगठित हुआ, भारत विश्वगुरु बना।
और जब-जब हम बिखरे,
तब-तब यह भूमि आक्रांताओं के पदचिन्हों से रौंदी गई।
आज फिर समय पुकार रहा है—
“उत्तिष्ठत, जाग्रत, प्राप्य वरान्निबोधत।”
यह सम्मेलन किसी से द्वेष का संदेश नहीं देता।
यह सम्मेलन कहता है—
हम स्वयं सशक्त बनें,
समरस बनें,और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यनिष्ठ बनें।
क्योंकि—
सशक्त हिन्दू समाज ही
सशक्त भारत की आधारशिला है।
आज के इस हिंदू सम्मेलन के पश्चात अंचल के ग्रामीण जनों में एक उत्साह का संचार हुआ है जो आगे हिंदुत्व की एकता को मजबूत करेगा।
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